हर युवा को अपने फ्यूचर की चिंता हमेशा रहती है। वह चाहता है कि उसे एजुकेशन कंप्लीट होने के साथ ही अच्छी सेलरी के साथ मनचाही जॉब मिल जाए, लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं है।
हर युवा को अपने फ्यूचर की चिंता हमेशा रहती है। वह चाहता है कि उसे एजुकेशन कंप्लीट होने के साथ ही अच्छी सेलरी के साथ मनचाही जॉब मिल जाए, लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं है।
जयपुर। हर युवा को अपने फ्यूचर की चिंता हमेशा रहती है। वह चाहता है कि उसे एजुकेशन कंप्लीट होने के साथ ही अच्छी सेलरी के साथ मनचाही जॉब मिल जाए, लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं है। अगर इसे आपको आसान बनाना है तो इसके लिए पढ़ाई के साथ एक अच्छी प्लानिंग की भी जरूरत पड़ेगी। आपको अपने इंटरेस्ट के साथ यह भी देखना होगा कि किस फील्ड में वर्तमान दौर में जॉब के अच्छे अवसर उपलब्ध हैं। जॉब की दृष्टि से देखें तो साइंस की दुनिया बहुत व्यापक है। इसमें सभी फील्ड एक दूसरे से अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। जैसे मेडसिन व माइक्रोबायोलॉजी। इन दोनों को लाइफ साइंस भी कहते हैं। अगर हम बात करें माइक्रोबायोलॉजी की तो इनके विशेषज्ञों की बदौलत हाल ही कई संक्रामक बीमारियों जैसे कोरोना वायरस, जीका वायरस, एचआईवी और स्वाइन फ्लू आदि की पहचान से लेकर उपचार तक में सार्थक पहल की गई है। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ व डेयरी उत्पादों की जांच-पड़ताल करना भी अब माइक्रोबायोलॉजी के इस्तेमाल से काफी आसान हो गया है। चिकित्सा के क्षेत्र में शोध के अलावा जीन्स थैरेपी व प्रदूषण पर रोक की दिशा में माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने कई नए आयाम गढ़े हैं।
आखिर क्या है माइक्रोबायोलॉजी
यह बायोलॉजी की एक ब्रांच है, जिसमें प्रोटोजोआ, ऐल्गी, बैक्टीरिया, वायरस जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं पर अध्ययन और रिसर्च किया जाता है। इसमें माइक्रोबायोलॉजिस्ट इन जीवाणुओं के इंसानों, पौधों और जानवरों पर पड़ने वाले पॉजिटिव और निगेटिव इफेक्ट्स को जानने की कोशिश करते हैं। माइक्रोबायोलॉजिस्ट बीमारियों की वजह जानने में ये मदद करते है। इसके साथ ही जीन थैरेपी तकनीक के जरिए वे इंसानों में होने वाले सिस्टिक फिब्रियोसिस, कैंसर जैसे दूसरे जेनेटिक डिसऑर्डर्स के बारे में भी पता करते हैं।
माइक्रोबायोलॉजी में कोर्स
अगर आप माइक्रोबायोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं तो इसके लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी के साथ 12वीं पास करना पड़ेगा। वहीं, अगर पोस्टग्रेजुएशन करना चाहते हैं, तो इसके लिए माइक्रोबायोलॉजी में बैचलर्स डिग्री होना आवश्यक है। इसके बाद अप्लायड माइक्रोबायोलॉजी, मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी, क्लीनिकल रिसर्च, बायोइंफॉर्मेटिक्स, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, फोरेंसिक साइंस जैसे सब्जेक्ट्स में मास्टर्स कर सकते हैं।
बीमारियां बढ़न के साथ बढ़े कॅरियर विकल्प
दुनियाभर में बढ़ती नई-नई बीमारियों के कारण माइक्रोबायोलॉजी का क्षेत्र काफी अच्छा कॅरियर विकल्प बन गया है। माइक्रोबायोलोजिस्ट के तौर पर आप लेबोरेटरी, क्लिनिक, हॉस्पिटल, फार्मास्यूटिकल कंपनी, डेयरी प्रोडक्ट्स, टीचिंग, रिसर्च असिस्टेंट, और जैनेटिक इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट मेकिंग कंपनी सेक्टर में बेहतरीन कॅरियर बना सकते हैं। इस क्षेत्र में सरकारी और प्राइवेट दोनों सेक्टर में काफी अवसर हैं। इनका कार्य शरीर में होने वाले संक्रमण व इन्हें नियंत्रित करने वाले उपायों की खोज करना है। साथ ही ये नए रोगाणुओं की खोज भी करते हैं।
पब्लिक हेल्थ माइक्रोबायोलॉजिस्ट- इनका कार्य पानी एवं खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के दौरान उनमें फैलने वाली बीमारियों का अध्ययन करना और उन पर नियंत्रण पाना है।
एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजिस्ट- ये फसलों की सेहत सुधारने, उन्हें हानिकारक न होने देने, मृदा परीक्षण कर उसकी उत्पादकता बढ़ाने पर काम करते हैं।
माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट- इनका कार्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति एवं मिट्टी व पानी के रासायनिक चक्र में उनके महत्व को परखना है। ये वातावरण को प्रदूषित होने से भी बचाते हैं।
फूड एंड डेयरी माइक्रोबायोलॉजिस्ट- सभी तरह के फूड व डेयरी प्रोडक्ट्स पर सूक्ष्म जीवों के प्रतिकूल प्रभावों की जांच करना इनका कार्य है। डेयरी उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने का जिम्मा भी इन्हीं का होता है।
बायोमेडिकल साइंटिस्ट - जो लैब में कार्य करना चाहते हैं, वे बायोमेडिकल में जा सकते हैं। इनका कार्य जीवों मे बीमारियों का अध्ययन करने व जैविक सूचनाओं का सही प्रबंधन करते हुए उनके हानिकारक तत्वों को कम करना है।
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